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इंसान के लिए भगवान का कानून/कृपा कवच

जिस घर में हम रहते हैं उस घर को वास्तु के अनुसार देखकर पूरे परिवार के जीवन में चल रहे सभी कार्य (घटनाएँ) ईश्वर की कृपा से बताई जा सकतीं हैं और घर को वास्तु के अनुरूप ईश्वर की प्रेरणा से बनाने पर सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान हो जाता है। यह ईश्वर का विधान है।

वास्तु सिद्वान्तों पर विचार व समाज में चल रही मान्यताएँ
वास्तु का स्वरूप :–

भगवान अर्ध–नारीश्वर (जिनके शरीर का दायाँ आधा भाग पुरूष व बायाँ आधा भाग नारी है) के चरण ही वास्तु का स्वरूप हैं। दाएँ चरण का अगला भाग (अँगूठा और उंगलियाँ) पूर्व और पिछला भाग (एँड़ी) पश्चिम, पुरूषों का स्थान होता है। बाएँ चरण का अगला भाग (अँगूठा और उंगलियाँ) उत्तर और पिछला भाग (एँड़ी) दक्षिण, महिलाओं का स्थान होता है। भगवान के दाएँ और बाँए चरणों के अँगूठों के नाखूनों से गंगा जी प्रकट हुईं हैं।

शास्त्रों व समाज की मान्यता है कि ईश्वर की ईच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। परमात्मा हर प्राणी के अंदर बसते हैं। और सारा ब्रह्माण्ड उनके अंदर है। परमात्मा की कृपा से ही जीव (पेंड़–पौधे, पशु–पक्षी इत्यादि) चेतन होते हैं। वास्तु विद्या भी प्रभू की उसी कृपा के दर्शन कराती है। जो परिवार जिस तरह के कर्म करता है उसे उसी तरह के वास्तु का भवन/स्थान मिलता है। इस विद्या का ज्ञान होने पर भी, वास्तु दोष दिखाई नहीं देते। वास्तु तभी ठीक होगा जब प्रभू की कृपा होगी। हमारे जीवन में सुख का अर्थ आनन्द, दुख का अर्थ तप, यानि परम आध्यात्म, जो जन्म–जन्म तक जीव के साथ रहता है। हम दस दिशाओं व उनके दिग्पालों की पूजा करते हैं, विशेषकर शक्ति स्वरूप माता भगवती से हम दस दिशाओं का रक्षा कवच पाने की प्रार्थना करते हैं। जो परिवार ईश्वर के पूर्ण भक्त हैं, उन परिवारों को विशेष रूप से वास्तु रूपी ईश्वर की कृपा का कवच मिलता है और राजा जनक जैसी स्थिति प्राप्त होती है।

दिशाओं का परिचय :–
दस दिशाएं 1. पूर्व, 2. दक्षिण, 3. पश्चिम, 4. उत्तर, 5. साउथ–वेस्ट (नैरूति), 6. साउथ–ईस्ट (आग्नेय), 7. नार्थ–वेस्ट (वायव्य), 8. नार्थ–ईस्ट (ईशान), 9. भूमि, 10. आकाश हैं।

प्लॉट के फेसिंग का महत्व :–
प्लॉट पूर्व / उत्तर / दक्षिण / पश्चिम / नार्थ–ईस्ट / साउथ–ईस्ट/साउथ–वेस्ट/नार्थ–वेस्ट सभी दिशाओं का शुभ होता है और प्रत्येक दिशा का अपना विशेष महत्व है। वास्तु के अनुसार सही तरह से निर्माण करने पर उसके पूर्ण लाभ मिलते हैं।

प्रकृति/वास्तु द्वारा निर्धारित नियम :–
जिस प्रकार ग्रहों का घूमना, मौसम का बदलना इत्यादि प्रकृति के नियम हैं। इसी प्रकार वास्तु सिद्वान्त भी प्राकृतिक नियम हैं।

  • भूमि/भवन के नार्थ–ईस्ट भाग का सम्बन्ध धन, पूरे परिवार की सुख–शान्ति, पहली/चौथी/ आठवीं संतान और घर के कमाने वाले सदस्य से होता है। साउथ–ईस्ट भाग का सम्बन्ध सुख–शान्ति, प्रशासनिक कार्यों, महिलाओं व दूसरी/छठी संतान से होता है। साउथ–वेस्ट भाग का सम्बन्ध घर के मुखिया व पहली/पाँचवी संतान से होता है। नार्थ–वेस्ट भाग का सम्बन्ध सुख–शान्ति, प्रशासनिक कार्यों, महिलाओं व तीसरी/सातवीं संतान से होता है। उत्तर / दक्षिण भाग का सम्बन्ध धन, महिलाओं के स्वास्थ्य, मान–सम्मान व स्वभाव से होता है। पूर्व / पश्चिम भाग का सम्बन्ध पुरूषों के स्वास्थ्य, मान–सम्मान व स्वभाव से होता है।

  • पूर्व, पश्चिम, नार्थ–ईस्ट या साउथ–वेस्ट भाग में दोष होने पर, सबसे बुजुर्ग सदस्य जैसे दादा/पिता बीमार रहेंगे उनकी पहली, चौथी और पाँचवी संतान को ससुराल से परेशानी व धन की कमी रहेगी। दादा/पिता की मृत्यु होने पर डेढ़ बर्ष के अंदर–अंदर घर का सबस़े बड़ा पुरूष सदस्य बीमार हो जाएगा।

  • उत्तर, दक्षिण, नार्थ–वेस्ट या साउथ–ईस्ट भाग में दोष होने पर, दादी/माता बीमार रहेंगी, दूसरी, तीसरी, छठी व सातवीं संतान को प्रशासनिक समस्याएँ, धन की कमी, ससुराल से परेशानी, एक्सीडेंट, जेल, आग व चोरी की घटनाएँ होंगी। दादी/माता की मृत्यु होने पर डेढ़ बर्ष के अंदर घर की सबसे बड़ी महिला बीमार हो जाएगी।

  • जिस घर में माता–पिता निवास करते हैं, उस घर का वास्तु जैसा भी होगा वह उनकी संतानों पर लागू रहेगा, चाहें वह संतान कहीं भी रहे। माता या पिता में से किसी एक के भी जीवित रहने पर वास्तु लागू रहेगा।

  • माता/पिता दोनो की मृत्यु के पश्चात यदि एक ही भवन में जितने भाई–बहन निवास करते हैं, वह अलग–अलग परिवारों के रूप में माने जाएँगे। जो परिवार भवन के जिस भाग में रहेगा, उस भाग के दोष उस परिवार पर लागू हो जाएँगे।

  • माता/पिता दोनो की मृत्यु के पश्चात पति , पत्नी और बच्चे जिस घर में रहेंगे उस घर का वास्तु लागू होगा। यदि इनमें से कोई भी (पति/पत्नी/बच्चे) बाहर जाता या रहता है तो उस पर इस घर का वास्तु ही लागू होगा।

  • जिस भवन आप रहते हैं उसमें कोई भी रिश्तेदार जैसे चाचा, मामा, भांजा, साला, जीजा, फूफा, गुरू, सेवक, बुआ, मामी, चाची, नानी, नौकरानी इत्यादि निवास करते हैं तो भवन के जिस भाग में यह रहेंगे उस भाग का वास्तु और इनके अपने घर का वास्तु भी इन पर लागू रहेगा।

  • घर के किसी स्थान में दोष होने पर उससे सम्बन्धित संतान का विवाह भी उसी संतान से होगा जिसके घर में उससे सम्बन्धित स्थान में दोष होगा। जिस संतान का अपने घर में स्वयं से सम्बन्धित स्थान ठीक होगा उसका विवाह भी उसी संतान से होगा जिसका उसके घर में उससे सम्बन्धित स्थान ठीक होगा। अन्यथा विवाह संभव नहीं है। विवाह के बाद यदि किसी एक संतान का उससे सम्बन्धित स्थान ठीक हो जाता है तो दूसरे का स्थान भी डेढ़ बर्ष के अदंर स्वयं ही ठीक हो जाएगा, यह प्राकृतिक विधान है।

  • आपके भवन से सटते हुए उत्तर, पूर्व, नार्थ–ईस्ट, नार्थ–वेस्ट व साउथ–ईस्ट में अन्य निवास होने पर चाहें उसमें पशु रहें या मनुष्य, आपके भवन में वास्तु दोषों का प्रभाव आंशिक रहेगा। यदि इन दिशाओं में आपके भवन से सटकर अन्य भवन हैं किन्तु उसमें कोई निवास नहीं करता है तो आपके भवन में वास्तु दोषों का प्रभाव कम नहीं होगा।

  • गर्भपात या किसी संतान की मृत्यु होने पर उसे भी गिनती में उसी नम्बर पर माना जाएगा। पहली, पाँचवीं व नौवीं संतान यदि पुरूष है तो लगभग पूरी तरह से पिता पर जाएगी, यदि महिला है तो आंशिक रूप से माता पर भी जाएगी।

  • दूसरी, तीसरी, चौथी, छठी, सातवीं व आठवीं संतान माता और पिता दोनों पर लगभग समान रूप से जाएगी। यदि यह संतान महिला हैं तो माता और यदि पुरूष हैं तो पिता पर आंशिक प्रधानता रहेगी।

  • घर का कर्ता–धर्ता सदैव, पश्चिम / दक्षिण / साउथ–वेस्ट / साउथ–ईस्ट / नार्थ–वेस्ट भाग में और अन्य सदस्य व बच्चे सदैव पूर्व / उत्तर / नार्थ–ईस्ट भाग में ही रहते हैं।

  • विशेष परिस्थितियों में जो सदस्य पूरे परिवार का पालन–पोषण करेगा (जैसे बेटा बड़ा होकर परिवार की सेवा करने लगता है) तो कुछ समय के पश्चात (लगभग 12 बर्ष) उसे घर का पश्चिम / दक्षिण / साउथ–वेस्ट / साउथ–ईस्ट / नार्थ–वेस्ट का स्थान ही मिलेगा। वह पिता के स्थान पर आ जाता है और माता–पिता को अन्य सदस्यों या बच्चों का स्थान मिल जाता है।

  • परिवार में जमीन–जायदाद का बँटवारा होने पर अधिकतर घर की बड़ी संतान को सदैव साउथ–वेस्ट, दूसरी संतान को साउथ–ईस्ट, तीसरी संतान को नार्थ–वेस्ट और चौथी संतान को नार्थ–ईस्ट का भाग ही मिलता है।

प्राचीन मान्यताएँ :–   हमारे ऋषि–मुनियों ने वास्तु में जो ज्ञान दिया है वह पूर्णता से मान्य है। उस समय ज्यादातर भवन भूमि पर एक मंजिल तक बनाकर रहने का प्रचलन था। छत पर कोई निर्माण नहीं होता था। आजकल भवन बहुमंजिला बनते हैं और पूरी छत पर या कुछ भाग में भी निर्माण होता है। उनके द्वारा बताए गए वास्तु नियम हर मंजिल और छत पर समान रूप से लागू करने से उनकी कही हुई बात सत्य साबित होती है।

अक्सर लगने वाली गलतियाँ :––  हम लोग मुख्य द्वार उच्च (शुभ) स्थान में बनाते हैं किन्तु सीढ़ी और मुमटी भी इसी स्थान पर बना देते हैं। इससे मुख्य द्वार के अच्छे प्रभाव नहीं प्राप्त होते हैं बल्कि सीढ़ी और मुमटी के अशुभ प्रभाव होते हैं।
          ऊपरी मंजिल पर रसोई/टॉयलेट/बॉथरूम के निर्माण में संक/गढ्ढ़ा बनाया जाता है, जिसमें से गन्दे पानी के पाईप फर्श में से ले जाते हैं। इससे भवन का वह भाग मोटा और वजनी हो जाता है। जिस दिशा में इस तरह से निर्माण होता है, उसके भारी होने के प्रभाव लागू होते हैं। इसलिए संक/गढ़ढ़ न करें। भवन के केवल दक्षिण, पश्चिम व साउथ–वेस्ट भाग में ही मोटा व भारी कर सकते हैं।

मंजिलों पर प्रभाव :–   भूमि (फर्श) तथा आकाश (छत), इन पर किसी भाग में कोई भी निर्माण व गढ़्ढ़ा, बढ़ना, घटना, ऊँचा व नीचा होने का प्रभाव हर मंजिल में एक जैसा ही होता है। यदि किसी मंजिल पर निर्माण में कोई भाग बढ़ता या घटता है तो उसका प्रभाव उस मंजिल पर ही होगा।

टॉयलेट का स्थान:–   आजकल आधुनिक तरीके से टॉयलेट का निर्माण किया जाता है जिसमें गंदगी नहीं होती इसलिए टॉयलेट को भवन के किसी भी भाग में बना सकते हैं। टॉयलेट की सीट इस प्रकार लगाएँ कि सूर्यदेव(पूर्व) की तरफ मुख करके मल–मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए और यह भी ध्यान रखें कि सोते समय सूर्यदेव(पूर्व) की तरफ पैर नहीं होने चाहिए। इससे जीवन के अन्तिम समय में अत्यधिक कष्ट होते हैं। ध्यान रहे कि नार्थ–ईस्ट में कूड़ा/गंदगी वर्जित है।

मंदिर का स्थान :–   वास्तव में नार्थ–ईस्ट भूमिपूजन का स्थान होता है। मंदिर को दक्षिण , पश्चिम या साउथ–वेस्ट में ही बनाना चाहिए। हम अपनी सबसे प्रिय चीज भगवान को अर्पित करते हैं जैसे भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं जबकि उनके पास तो साक्षात गंगा जी हैं, इसी तरह भगवान को धन चढ़ाते हैं जबकि वह स्वयं लक्ष्मी–नारायण हैं। घर के मुखिया का स्थान दक्षिण , पश्चिम व साउथ–वेस्ट है, यहाँ मंदिर होने पर भगवान स्वयं घर के मालिक के रूप में रक्षा करते हैं। अनेक प्रसिद्व मंदिरों जैसे तिरूपति बालाजी, बाँके बिहारी जी, गोल्डन टेम्पिल, लोटस टेम्पिल इत्यादि में भगवान का स्थान दक्षिण , पश्चिम व साउथ–वेस्ट में है व द्वार पूर्व , उत्तर व नार्थ–ईस्ट में है।

रसोई का स्थान :–   मान्यताओं के अनुसार रसोई को साउथ–ईस्ट में ही बनाया जाता था। क्योंकि हवाएँ अक्सर पश्चिम से पूर्व व उत्तर से दक्षिण की ओर ही चलती हैं, इसलिए साउथ–ईस्ट कोने में रसोई का निर्माण होने से धुआँ घर के अन्दर नहीं आता था। शंशोधित नियमों के अनुसार रसोई व बिजली के मीटर को घर में कहीं भी बनाया जा सकता है।

पैराफिट/कम्पाउन्ड वॉल:–   पैराफिट/कम्पाउन्ड वॉल के निर्माण में चारो दीवारों की ऊँचाई एक समान कर देते हैं और इसके बाद फर्श/छत का ढ़ाल वास्तु नियमों के अनुसार नार्थ–ईस्ट की ओर बनाया जाता है। तल से मापने पर नार्थ–ईस्ट कोना ऊँचा हो जाता है व साउथ–वेस्ट कोना नीचा हो जाता है। इसके अशुभ प्रभाव होते हैं।

गढ्ढ़े के प्रभाव:–   बोरिंग, सेप्टिक टैंक, अन्डरग्राउन्ड वॉटर टैंक या किसी भी प्रकार का कोई गढ्ढ़ा घर के अंदर होने पर इसके गम्भीर व घर के बाहर होने पर आंशिक प्रभाव होते हैं।

खम्भा / एंटीना:–   छत के किसी भाग में ध्वज / एंटीना / खम्भा इत्यादि लगाने से उस भाग की ऊँचाई उतनी ही बढ़ जाती है। उत्तर , पूर्व , नार्थ–ईस्ट , साउथ–ईस्ट और नार्थ–वेस्ट भाग में ऊँचाई का बढ़ना अशुभ है। खम्भा इत्यादि सिर्फ दक्षिण , पश्चिम व साउथ–वेस्ट की दीवार पर ही लगाने चाहिए।

अक्सर लकड़ी की अलमारियों में दीमक लग जाती है, यह एक बुरा अपशकुन है। दीमक उन्हीं अलमारियों में लगती है जो वास्तु के अनुसार भवन में गलत जगह पर बनी होती हैं। एक तरह से यह दीमक इन लकडि़यों को धीरे–धीरे खाकर वास्तु दोष ही दूर करती हैं। इन दीमक लगी हुई लकडि़यों को दवाई डालना , आग लगाना या पानी में नहीं डालना चाहिए, इससे जीवों की हत्या होती है। इसलिए इन लकडि़यों को किसी खुली जगह में छोड़ देना चाहिए और झाडि़यों को भी आग नहीं लगानी चाहिए, इनमें अनेक प्रकार में जीव निवास करते हैं, इससे जीवों की हत्या होती है।

प्रकृति ने पूरी पृथ्वी पर निवास करने वाले जीवों को बहुत ही अच्छी तरह से अपने नियमों के अनुसार व्यवस्थित किया हुआ है। इस नियमों के अनुसार प्रत्येक स्थान चाहें वह बेडरूम/घर/आफिस/मंदिर/धर्मशाला/सत्संग स्थल/सभा स्थल कुछ भी हो, वहाँ मुखिया व उच्च सदस्य सदैव क्रमश: साउथ–वेस्ट, साउथ–ईस्ट व नार्थ–वेस्ट भाग में ही रहेंगे व छोटे सदस्य सदैव नार्थ–ईस्ट, पूर्व व उत्तर भाग में रहेंगे।

हमारे जीवन से जुड़े सभी व्यक्तियों लिए हमारे मन में श्रद्वा व दया दो तरह के भाव होते हैं। जैसे माता–पिता, गुरू, बड़ा भाई–बहन या सांसारिक कोई भी पूज्यनीय रिश्ता, इनके लिए हमारे मन में श्रद्वा भाव होता होता है। जब हम उनकी इतनी सेवा कर लेते हैं कि हमारा आध्यात्म या पुण्य उनके अधिक हो जाता है, तो हमारे मन में उनके लिए श्रद्वा भाव न रहकर दया भाव आ जाता है और उनके मन में जो हमारे प्रति पहले दया भाव रहता था वह श्रद्वा भाव में बदल जाता है। इसी तरह जैसे बेटा–बेटी, छोटे भाई–बहन, शिष्य व उसका पुण्य व आध्यात्म हमसे अधिक हो जाता है तो उनके प्रति हमारे मन में श्रद्वा भाव आ जाता है और उनके मन में हमारे लिए दया भाव आ जाता है। यह ईश्वरीय विधान है। इससे यह सिद्वहोता है कि पूरी श्रृष्टि में पुण्य व आध्यात्म ही एक सबसे बड़ा धन है। यदि हम किसी समिति के अध्यक्ष होने पर किसी व्यक्ति को किसी आध्यात्मिक कार्य के लिए जैसे मंदिर सेवा, भगवत या राम कथा इत्यादि के लिए नौकरी पर रखते हैं, सांसारिक रूप से वह हमारा सेवक है किन्तु क्योंकि उसका आध्यात्म हमसे काफी अधिक होने के कारण हम उसके प्रति श्रद्वा रखते हैं और सदैव उसका सम्मान व चरण वंदना करते हैं।

जिस व्यक्ति का आध्यात्म सबसे अधिक होगा वह मुखिया के स्थान पर आ जाएगा। वास्तु के अनुसार वह उच्च स्थान क्रमश: साउथ–वेस्ट, साउथईस्ट व नार्थ–वेस्ट भागों में ही रहेगा। सांसारिक रूप से चाहें वह रिश्ते में छोटा ही क्यों न हो।

जिस प्रकार बेडरूम में प्रत्येक संतान व सदस्य का स्थान निर्धारित होता है उसकी प्रकार यदि घर के मुखिया के कमरे के किसी कोने में दोष है तो उस कोने से सम्बन्धित संतान पर इसका प्रभाव लागू होगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अलग–अलग कमरों में रहता है तो उन पर उनके कमरों का वास्तु भी लागू होगा।